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Monday, February 10, 2025
Tuesday, October 29, 2024
मैं भीड़ में नहीं चलूँगा
मैं भीड़ में नहीं चलूँगा
भीड़ में मुझे चलना भी नहीं आया!
भले सारे ही जा रहे हों
क्षितिज के उस पार!
सुना है मैंने, कि
वहाँ शांति बिखरी हुयी है चारों ओर
पक्षियों का कलरव-संगीत भरा है बयार में
संतोष की आभा फैली है सबके चेहरों पर
और, प्रकृति अपने प्राकृतिक रूप में है अभी भी!
जानता हूँ मैं तुम्हारे प्रेम को
मुझे खींच ले जाना चाहते हो
ठीक उसी दुनिया में, जहाँ
रीतियों में बँधकर मुक़्त हैं!
किंतु! मुझे स्वीकार है
यह मुक्तता का बंधन!
मनुष्य की नग़्न आत्मा की कुरूपता
और टूटती प्रकृति का यह शोर!
छोड़ों! रहने दो मुझे यहीं पर
मैं भीड़ में नहीं चलूँगा,
मैं भीड़ नहीं हो पाऊँगा!
-अमर कुशवाहा
Wednesday, June 12, 2024
मेरी हंसिनी
और जिनसे कुछ कहने से पहले ही सारी बातें
बस कण्ठ तक आकर रुक गयीं!
जिन्हें जी भरकर देखना भी चाहा तो केवल
बस एक झलक ही देख पाये
कभी जिनके साथ जीवनभर रहने की चाह थी
बस केवल दो पल ही रह सके
और इस तरह घुट कर रह गई दो जिंदगियां!
अब मुलाक़ातें नहीं होतीं
बातें भी नहीं होती
एक झलक देखना भी नहीं होता
बस रह गया है सपनों का झरोखा
जिससे कभी झांक कर हम दोनों
कभी कभी नींदों में बस मिल लेते हैं
और याद कर लेते हैं
कि कभी साथ में बिताये थे कुछ बसंत
कुछ सावन की बूँदों ने हमें साथ भिगोया था
किसी वट की छाया में साथ साथ सोये थे
हमें देखकर किसी ने हंसों का जोड़ा कहा था।
मेरी हंसिनी!
अब भी याद हो तुम!
शायद कभी समय की धार से
कोई एक सोता बह निकले
और हम मिल सकें
जैसे मिलते हैं रात और दिन
धरती और अम्बर।
-अमर कुशवाहा।
१५.१२.२०२१
Tuesday, September 5, 2023
रात और दिन
और दिन बस जगा रह जाता है।
कहाँ तो ख़्वाब आते हैं रात के सपनों में
कुछ मीठे, कुछ खट्टे
कुछ नयीं तदवीरों की तस्वीर लिये
तो कुछ बीते पलछिन के धुँधले अक़्स
रात कभी ख़ामोश सी दिखती है
कभी हौले से मुस्कराती भी है
और दिन जगा सा उसे देखता रहता है
कभी ख़ामोश तो कभी मुस्कुराते हुये।
रात को सुलाने के लिये हर कोई लोरी गुनगुनाता है
पर दिन डूबा रहता है यथार्थ के शोर तले
कोई लोरी सुनाना भी चाहे तो दब जाती है चीख़ों में
और दिन बेचारा जगा ही रह जाता है।
रात का सूनापन भारी पड़ता है दिन के उजाले पर
शायद कभी तो वह शाम आये
जब रात ख़ुद दिन को अपनी गोदी में सुलाये
लोरी न सुनाये, न सही
बस अपने आँचल में ढककर
सदियों से दिन सोया नहीं है
उसकी आँखें भी शाम को बोझिल होती हैं थककर
शायद रात की थपकी से वह भी सो जाये
उसे भी वही सुकून चाहिये और वही स्वप्न
वह भी नींद में मुस्कराना चाहता है।
Sunday, July 24, 2022
मुक्ति
जितना कि सच सुनना!
टूट जातीं हैं...एक-एक कर
वर्षों से बनायीं सारी भ्रांतियाँ,
वर्षों की अर्जित सीख,
वर्षों से संजो कर रखे झूठ,
और तो और,
निकलना ही पड़ता है
ख़ुद के पिंजरे से
जिसे हम घर समझ बैठे थे!
घर झूठा ही सही
त्यागा नहीं जाता!
और शायद, इसलिए
कोई सच नहीं सुनना चाहता!
पर, मैं मिलना चाहता हूँ
ठीक किसी ऐसे शख्स से
जिसमें सच सुनने का साहस हो
ताकि मैं भी साहस जुटा सकूँ
और उससे मिलकर, उसके द्वारा
अपना सच सुन सकूँ!
क्योंकि, जो धारक नहीं
वह उद्धारक नहीं हो सकता!
काश! कोई मुझे मिल जाये
सच सुनने वाला
मैं बस अपने पिंजरे से
मुक्त होना चाहता हूँ!
Monday, June 6, 2022
नया मापदंड
पुरानी ग़लतियाँ फ़िर से दिखलाईं गयीं!
Tuesday, March 29, 2022
अपने-अपने क़िरदार
Tuesday, March 8, 2022
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
बस थोड़े ही देर में जब
घड़ी रात के बारह बजायेगी
तो विलुप्त हो उठेंगे
वो पंक्तियाँ, वो संदेश
ठीक किसी एंडेंजर्ड स्पेसीज़ की तरह
चलो डायनासोर ही मान लो!
कल सुबह से पुनः
लोग माँगेंगे राम-राज्य
सीता-राज्य की बात तो
किसी कल्पना में न होगी!
कल सुबह से पुनः
लोग माँगेंगे एक-कप चाय
प्रश्न करेंगे थोड़ी सी ही देर होने पर!
कल सुबह से ही पुनः
माँ रसोई में खटती रहेगी
बहनों के कपड़े देखे जाएँगे!
कल सुबह से ही पुनः
तुम्हारी नौकरी को आर्थिक स्वतंत्रता कहकर
कोई तुम्हारे अर्थ पर पूर्ण नियंत्रण रखेगा!
कल सुबह से ही पुनः
तुम भूल जाओगी
कि तुम भी मनुष्य हो!
कि प्रश्न करना ही
मानव होने का पहला धर्म है!
यदि, केवल आज के दिवस पर तुम इठलाओगी
तो भूलो मत! याद रखो!
गिद्ध हैं और भेड़िए भी हैं चारों तरफ़
तुम्हें नोंच-खाने के लिए!
केवल आज की मीठी चाशनी में मत घुल जाना
तुम्हें हथियार बनना होगा
हर दिन लड़ना होगा
प्रत्येक दिन ऊपर उठना होगा
यह साबित करने के लिए
कि तुम भी मनुष्य हो
कदाचित् मानवों में भी श्रेष्ठ!
-अमर कुशवाहा
Sunday, February 13, 2022
लोकतंत्र
Saturday, October 16, 2021
आवारा कवि
सड़कों पर घूमता रहता था बिना किसी प्रयोजन के,
या फ़िर यूँ कहूँ कि, उसके प्रयोजन का
अपना कोई भी व्यक्तिगत आधार नहीं था!
जब भी देखता किसी बूढ़े-लाचार को भीख माँगते
बिना किसी की परवाह किये बैठ जाता था उसके पास
पूछने को उसका हाल? आखिर वह लाचार क्यों हुआ?
अभिजात्यवादी चेतना के कारण? या फ़िर
कैपिटलिस्ट मूल्य रही उसकी वजह; कि जो
अर्थव्यवस्था में अर्थोपाजन न कर पाये
वह केवल बोझ है समाज पर? या फ़िर
कोई नितांत वैयक्तिक कारण?
कि तभी कहीं एक ज़ोर की आव़ाज हुयी
जैसे कि बादल ख़ूब जोर से गरज़ पड़ा हो!
उसने देखा एक छटपटाता हुआ बेज़ान शरीर
सड़क पर लहुलुहान पड़ा हुआ!
वह बैठा नहीं रहा, दौड़ पड़ा उस एक्सीडेंट वाली जगह पर
ज़ोर-ज़ोर से पुकारता रहा, सब बगल से गुज़रने वालों को
तमाशाई भीड़ थी, केवल दो हाथ नहीं बढ़ सके सहारा देनें!
और कुछ पल बाद शरीर का तड़पना बंद हो गया!
आँखों में पानी भर वह उठ चला
और वह चलता ही रहा, जब तक कि
शहर भर नहीं गया कृत्रिम रौशनी से
सब कुछ उजला-उजला, सब कुछ साफ़!
वह चीखता रहा, चिल्लाता रहा
जी भर कर कोसता रहा सबको
अपनी संवेदनाओं में तड़प-तड़प कर
गरियाता रहा इस कृत्रिमता को
और इसी उपक्रम में थक-हार
बेहोश होकर वह बेदम हो गया!
अगले ही दिन 'आवारा कवि' नाम से से
एक विडियो यूट्यूब पर खूब मशहूर हो रहा था
जो राह चलते बना ली थी किसी ने पिछले दिन
अब उसे करोड़ो देख-सुन रहे थे पैसे ख़र्च कर
पर उसे तब नहीं सुना किसी ने
जब वह कुछ सुनाना चाहता था!
-अमर कुशवाहा
Thursday, May 20, 2021
तैरती लाशें
Friday, August 14, 2020
अ-परिवार
वो जो
रांझे की हीर थी
उसकी न
कोई तदवीर थी
कट-मर
जो चली गयी
मेरी
नज़र में वह वीर थी!
राधा-कृष्ण
को मानते सब
प्रेम
की पीर को जानते सब
यदि घर
में कहीं प्रेम दिखा
तलवार
निकाल तानते सब!
सब कहते
हैं कि मधुमास है
पर मिलता
कहीं न समास है
तोड़ता
है अब जोड़ने वाला
बस यही
बड़ा विरोधाभास है!
राखी थी
बंधी उन हाथों पर
जो थे
बरसे उसके तन पर
रक्षक
बनना प्रण जिनका
काट रहे
कुल्हाड़ी बनकर!
थे भाई
और जनता कुल नौ
किया
बदन के टुकड़े पूरे सौ
कुछ
बोटी व रक्त दिखा तब
तडके जब
फटने लगा था पौ!
क्या
प्रेम इतना बड़ा पाप है?
फ़िर
जनता क्यों चुप-चाप है?
उन
टुकड़ों पर थूका जिसने
लड़की-लड़कों
का ही बाप है!
सोचा!
माँ की क्या ही छाती है?
किन
पापों का फल पाती है?
ममता ने
देखा, भस्म हो गयी
जब माँ
पूरी-खीर पकाती है!
तब चपला
जा कौंधी मेघ पर
गिर-गिर
पड़ती आ धरती पर
क्यों
प्रकृति न हो रौद्र भला
रांझे-हीर
की चीत्कार पर?
हे
मानव! अब सुन ध्यान से
चमकी
वाणी आसमान से
सागर की
लहरें रोक सका
कोई बना
कर ऊँची बाँध से?
आदम-हव्वा
के जमाने से
श्रद्धा-मनु
के ठिकाने से
ईश्वर
भी क्या रोक सका है
उस
वर्जित फल को खाने से?
भूल गये
क्यों मेरा रूप?
मुझसे
ही मिलती छाँव-धुप
मैंने
थी हँसती सृष्टि बनायी
तुम
क्यों बन बैठे अंध-कूप?
हवा का
बहना ही तय है
झरने का
गिरने में ही लय है
है
प्रेम ही जग का बीजमंत्र
स्वीकार
में फ़िर क्यों भय है?
तुम
टोकोगे वह अड़ जायेगा
तुम
रोकोगे वह बढ़ जायेगा
यदि
रिश्तों से प्रेम रूठ गया
तुम
काटोगे वह लड़ जायेगा!
बहुत
हुआ अब तू बस कर
स्वाभाविक
है स्वीकार कर
झूठे
नाक के भेद-भाव में
न
रिश्तों को शर्मशार कर!
यदि तू
अब भी न पछतायेगा
तो एक
दिन ऐसा पल आयेगा
बोटी और
गिद्ध ही पसरे होंगे
मानव
धरा पर न रह जायेगा!
-अमर
कुशवाहा
Wednesday, July 22, 2020
पगडंडियाँ
एक लंबे अरसे से
राह तकती हैं पगडंडियाँ
बगल के खेतों ने अक्सर
उन्हें बिलखते ही देखा है!
न!
आँसूं नहीं निकलते अब!
जब इंतज़ार की सीमा नहीं होती
सूख जाते हैं आँसूं अक्सर,
और बच जाती है केवल वेदना!
पर जब कभी भी वेदना का
पारावार चढ़ जाता है
तो निकल ही पडतें हैं आँसूं
और फ़िर धूल से मिलकर
चिपक पड़ते हैं
गाड़ियों के टायरों से!
पर इससे पहले कि पहुँच पायें
वो अपने प्रिय तक
हवा और धूप उन्हें सुखाकर
छोड़ देती है
किसी वीरान परती में!
कभी भूले से कुछ
पहुँच गये अपने मकाम तक,
तो अलग-थलग से दिखते हैं
चमकते संगमरमर पर!
और फ़िर उन्हें बुहारकर
फेंक आते हैं लोग
किसी गन्दी जगह पर!
एक समय था!
मैं भी लौटता था उन्हीं
पगडंडियों पर लोटने को
महाभारत के नेवले की तरह!
जो सुनहरा हो गया था!
मेरे गाँव की पगडंडी पर
बिखरी धूल में छिपी है
किसी की ममता,
त्याग और करुणा!
मैं भी सुनहरा हो गया था
उसी में लोट-लोट कर!
बस!
अब वहाँ लौट नहीं पाता!
-अमर कुशवाहा
Tuesday, March 31, 2020
सर्वहारा
ग़रीब और मज़लूमों का
इससे पहले कि सर्वहारा
सब कुछ हार जाये।
मैं जानता हूँ कि
'सब कुछ'हारने के लिये
'कुछ' होना भी चाहिये!
इन शब्दों के चक्रव्यूह से
अब निकल जाने दो इन्हें!
इन्हीं शब्दों के जाल में
उलझकर रह गयीं इनकी
पीढ़ी दर पीढ़ियाँ!
सबने रोटी ही सेंकी है
इन्हें धूप में जलाकर!
यह अन्तर कभी ख़त्म नहीं होगा!
चाहें तो लिख लो
या फिर,
शिलालेख ही गढ़वा लो
मैं रहूँ, न रहूँ,
मेरे ये शब्द रहेंगे!
कोई इस गड्ढ़े को नहीं पाटेगा!
यह 'सब कुछ' और
'कुछ' के बीच जो अन्तर है
वह है इनकी 'देह'!
किसी को उसका पसीना चाहिये
किसी को रक्त!
बस!
-अमर कुशवाहा
Friday, January 11, 2019
विसंगति...
जान का देखो मोल कहीं पर
कहीं साँस है खोटी रे!
बिखरे पड़े कहीं पिज्जा-बर्गर
कहीं सूखी-चिपड़ी रोटी रे!
कहीं शाम है भीगी फ़व्वारे से
कहीं फ़सल पड़ी है परती रे!
सत्ता की चर्चा छिड़ी कहीं पर
कहीं रातें बीती सिसकती रे!
कहीं दिखें बच्चे हाथी से
कहीं हाड़-मांस का लोथा रे!
हद से ज्यादा कनक कहीं पर
कोई पाई-पाई को रोता रे!
कहीं अंग्रेज़ी के बोल खिले
कहीं टाट पर फ़ैली शिक्षा रे!
कहीं फ़ोन पर डॉक्टर हैं आते
कहीं मिलती हैं केवल भिक्षा रे!
हल-वालों की बिसात ही क्या?
बैलों का पिंजर दिखता रे!
छोटे-छोटे क़र्ज़ तले जब
घड़ी-घड़ी वह बिकता रे!
कहीं मौका है आगे बढ़ने का
कहीं बिखरी अर्थ की लाठी रे!
कहीं शान से सोना-उठना
कहीं रात में केवल फाँसी रे!
चला गया जो चला गया
कौन रहा फ़िर बाकी रे!
दुःख-भूख में रोते छप्पर वाले
कोई संगी न साथी रे!
कुछ दिन चर्चा अखबारों में
अलग-अलग सब बोली रे!
फ़िर चुपके से कर देता इंडिया
भारत से आँख-मिचौली रे!
-अमर कुशवाहा
Friday, January 5, 2018
डराओ, जितनी कि मरज़ी तुम्हारी...
डराओ, जितनी कि मरज़ी तुम्हारी
कि कुर्सी पर बैठे हो है हुक़ूमत तुम्हारी।
डराओ, मगर याद इतना तुम रखना
कि डर की भी सीमा होती है प्यारे
जहाँ सबकी साँसे गिरवी है प्यारे
ऐसा न हो किसी रोज़ सबेरे ही उठकर
जान जाये यह जनता तुम्हारी अय्यारी
डराओ, जितनी कि मरज़ी तुम्हारी
कि कुर्सी पर बैठे हो है हुक़ूमत तुम्हारी।
कभी किसी की बातों का कोना पकड़ते हो
कभी भूखे-नंगों का सोना पकड़ते हो
फटे-हाल लोगों को न राह दिखाई
लगते हो देने बीते सालों की दुहाई
कभी जिसने हिम्मत करके कुछ बोला
तुमने क़ानून से उसका ताला है खोला
मुफ़्त में मारी जाती है जनता बेचारी
डराओ, जितनी कि मरज़ी तुम्हारी
कि, कुर्सी पर बैठे हो है हुक़ूमत तुम्हारी।
हाथों ही हाथों में सेठ तुम्हें तौलते हैं
मुक़द्दर का सिकंदर लोग तुम्हें बोलते हैं
जहाँ जाते जनता से हुंकारी भराते हो
अपनी ही सारी लाचारी गिनाते हो
लेकिन हे निष्ठुर न तुमने यह सोचा
कभी जनता की लाचारी को तुमने पूछा?
यही पाँच सालों में जाके लाईन लगायेंगे
वोटों से अपने किसी और को बिठायेंगे
अगर अपने कामों से दोगे जनता को झटका
कुर्सी से हटने की फिर कर लो तैयारी
डराओ, जितनी कि मरज़ी तुम्हारी
Monday, December 11, 2017
मुझे पता था...I knew it!
मुझे
पता था!
वह
मेरे जीवन में आयेगा
जब
आँखों से नींदें ओझल होंगी
पत्तों
पर पड़े ओंस के बूँद सा!
मुझे
पता था!
वह
मुझे बहलायेगा
जब
सब-कुछ शांत हो गया हो
एक
मूसलाधार बारिश के बाद!
मुझे
पता था!
वह
इंद्रधनुष के स्वप्न दिखलायेगा
जब
नीरसता के बादल होंगे
दुःख
और अतृप्त भावनाओं के बाद!
मुझे
पता था!
वह
मुझे प्रेम नहीं करेगा
बस
मेरी प्यासी आत्मा को छूएगा
पास
होकर भी बहुत दूर!
मुझे
पता था!
I
knew it!
She’d
come in my life
When
sleep be gone out of eyes
Like
the dew on the leaves!
I
knew it!
She’d
amuse me
When
everything becomes quite
After
a torrential rain!
I
knew it!
She’d
show the dreams of a rainbow
When
there be clouds of drabness
After
the grief and sate-less emotions!
I
knew it!
She’d
not love me
But
touch my thirsty soul
Though
near yet too far!
I
knew it!
-अमर कुशवाहा
