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Thursday, January 18, 2024

मेला

                             १.

बड़े ज़ोर-शोर से मुनादीं करवाई जा रही थी

कि शहर में आयोजन होना था दुनिया के सबसे बड़े मेले का

और फिर पूरे शान-औ-शौक़त से निकलेगी राजा की सवारी

जिसे अपने राजा होने का अतिशय ही दंभ था।

सारा शहर झूम रहा था, मानों

स्वर्ग से हो रही हो वर्षा -सोमरस एवं पुष्पों की!

शहर ज़रूर चमक रहा था, पर गौर से देखने पर दिखतीं थी

चारों तरफ़ चलती-फिरती लाशें, बिन आँखों के,

जो देख तो नहीं सकते थे पर ख़ुश थे मेले के आयोजन पर।

किसी मंत्री ने मंच पर चढ़कर राजा को देवराज इंद्र की उपाधि दे डाली,

क्योंकि उसके अनुसार शहर अब स्वर्ग बन चुका था।

किसी दूसरे ने उद्घोषणा की की राजा में त्रिदेव की झलक मिलती है;

भले ही तीनों देवों को मिलाकर पुराणों में कोई अवतार ही न रहा हो।

किसी को राजा में पंचतत्व का जनक दिखा तो किसी को

कलियुग में कल्कि का अवतार,

जिसका जन्म कलि के ताप को हरने के लिए हुआ था।

हर एक प्रशंसा पर राज का सीना और भी चौड़ा होता जा रहा था।

जहाँ तक भी लोमड़ियों और बंदर सरीखों जैसे मानवों की पहुँच थीं,

वहाँ तक इस सबसे बड़े मेले की ख़बर पहुँचाई जा रही थे।

                              २.

वहीं मेला-स्थल से कुछ दूरी पर,

ज़्यादा दूर नहीं, बस कुछ ही दूर, जिसे

ढँक दिया गया था, बरसातियों से, परदो से,

के ठीक दूसरी तरफ़ बहता था एक नाला,

बड़ा सा, मैला, बदबूदार, बज़बाजाता, और 

उससे सटी, ठीक पास में ही अनेकों झोंपड़े।

नंगे-धडंगें, मिट्टी-कीचड़ में लोटपोट जहाँ खेल रहे थे कुछ बच्चे।

वहीं पास के ही एक टूटे हांड़ी में रखे पानी से

गंदे बर्तनों को धो रही थी उनकी माँ, और

अंदर बीमार खो-खो कर ख़ासता हुआ उनका बाप।

दौड़ रहीं थी कुछ बकरियाँ और मुर्गियाँ उन्हीं गंदी गलियों में

और थे कुछ कुत्ते, भूखे, मरियल  से, जो बस भौंकते जा रहे थे।

टूटी-फूटी झोपड़ियाँ और अंदर बिखरे हुए सामान इधर-उधर

मुन्ना के फटे हुए पैंट के कपड़े का बना हुआ बस्ता,

और लटका हुआ अरगनीं पर फटे-पुराने सबके कपड़े,

ज़मीन पर एक किनारे फ़ैला कर रखा हुआ पुआल, जिसपर सोता था

पूरा परिवार थक-हराकर,और अभी लेटा था खाँसता हुआ बाप।

वहीं एक कोने में बंधी थी बकरी, और उसके दूसरी ओर

मिट्टी का चूल्हा एवं उसमें बिखरी हुई राख़,

और पास में पड़े कुछ ख़ाली बर्तन।

                              ३.

और फिर होता है राजा का भाषण! एक-एक कर चुने हुए शब्द, या फिर

भविष्यवाणी और झूठ की चाशनी में पिरोए हुए अनेकों टूटे ख़्वाब!

सब खिलखिला उठते हैं मेले में, नारे लगाते हैं, 

जय-जयकार होता है राजा का, राजा और भी गर्वित हो उठता है!

फिर फूटते हैं पटाखें और रौशनी फैल उठती है आसमान में,

आसमान रंग-बिरंगी हो उठता है मानों नृत्य करता हो, और

पहुँचाना चाहता हो राजा की कीर्ति स्वर्ग- मण्डल तक।

कि वही रौशनी देख कर दौड़ पड़ते हैं, उसे पकड़ने को

उस पार के वही नंग-धडंग और कीचड़ में लिपटे हुये बच्चे, कि

बर्तन माँजना छोड़, दौड़ कर पकड़ लेती है उनकी माँ और बचा लेती है

नाले में गिरने से, और समझाती है बच्चे को और ख़ुद को भी,

कि यह केवल नाला ही नहीं, यह खाई है खाई!

और खाइयों में नाव-पतवार नहीं चलती!

हम कितनी भी कोशिश क्यों न कर लें, कोई भी

उस शहर का हमें यह पार नहीं करने देगा!

और मायूस सा सिसकता हुआ बचपन चिपक जाता है माँ की छातीं से

और ढुलक पड़ते हैं माँ की आँखों से अश्रु के दो बूँद!


-अमर कुशवाहा

०९/०८/२०२३

Monday, December 4, 2017

भारत के भविष्य का शव

अभी माँ की ममता का आँचल

पूरा पसर भी पाया था

पिता के कंधे पड़े थे

शांत, अचेत, निर्विकार।

अब नहीं बैठेंगे उनपर आँख के तारे

भले ही मेलाओं की भीड़ हो।

किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा था देश आज

लादे हुये अपने जर्जर काँधे पर

अनगिनत शव अपने भविष्य का।

 

कुछ ने तो सीखा ही नहीं था

अब तकमाँबोलना,

ताकि लाल हो सके

लाल की लाली से उसकी माँ।

नहीं! लाल नहीं होने पायी धरती

गोरखपुर के मासूम साठ नौनिहालों के

स्वप्नों की काया में रक्त बचा कहाँ था?

बस बचा रह गया था कुछ तो,

वह थी माँ की टूटी आशा और

पिता की अतृप्त ईच्छा

कि बड़ा होकर बनेगा

उनका छोटा पुत्र श्रवण कुमार।

वह प्रधानमंत्री भी बन सकता था

या फिर मिसाइल मैन।

नियति का दुर्भाग्य कहूँ, या फिर

राजनीति की गंदी बिसात।

सो चुके थे सारे छः फ़ीट भूमि के नीचे

तोड़ सारे स्वप्न और

आँखों में उनकी आस लिये।

 

क्यों नहीं छिड़ा देशव्यापी आंदोलन?

क्यों नहीं हुआ सड़कजाम?

कहाँ छिप गया था मीडिया का पावर?

क्या केवल उन्हीं लाशों का अर्थ है

जिनकी जान जाती है

आतंक की गोलियों से?

या फिर उस भ्रष्टाचारी नेता का जिसके

मृत्योंपरांत होता है उसका महिमामंडन?

और दे दिया जाता है

कुछएक एकड़ भूमि का टुकड़ा!

ताकि बन सके उसकी समाधि,

जब कि शहरों की चौथाई आबादी

सोती हो फुटपाथ पर।

 

बस देखते ही रह गये थे

राम, ईश और अल्लाह।

कोई भी नहीं आया बचाने

भारत के भविष्य को।

जिन पर उत्तरदायित्व था, उन्हें

क्यों नहीं मिला प्राणवायु के सिलेण्डर।

बस सब भिड़े पड़े थे

कोसनें में एक दूसरे को।

कोई किसी को लापरवाह बताता

तो कोई अगस्त माह की ग़लती।

बस फेंकने में लगे थे

अपने कंधे पर रखे भारत के

भविष्य के शवों को

दूसरे के काँधों पर!

 

बस पकड़ा दिये जाते हैं

चंद रूपये मुआवज़े के नाम पर!

पर उससे लौट नहीं पाती

वापिस बच्चों की किलकारियाँ।

किंतु यह भीषण दुःख

केवल कुछएक का नहीं।

कब तक फेंकते रहेंगे

भारत के भविष्य के शवों को

एक दूसरे के काँधों पर?

कब तक ऐसे ही बिछी रहेंगी

राजनीति की गंदी बिसातें और

प्रभाव एवं परिचयवाद का असर?

यदि, यही रहा, तो

निश्चित ही किसी किसी दिन

होगा अपने ही काँधे पर

अपने ही घर के भविष्य के

शव का बोझ।

-अमर कुशवाहा

Monday, August 21, 2017

मित्रश्रेष्ठ

गए सखा! हे मित्रश्रेष्ठ!
पूरी होगी साध
आज पाकर दर्शन
तुम्हारे चरण-कमलों की!
कुंड भर उठे हैं आँखों के
सूख चुके जो बिन दर्शन

जीर्ण-शीर्ण मानव के
माँस-विहीन शरीर को लख
अश्रुधार हैं छूट पड़े
आँखों से उस मित्र के
जिसके चरण-कमल से ही
गंगा का उद्भव हुआ था I

सभा थी शांत!
बिखर पड़ा था सन्नाटा!
हो सन्निपात, उस राजसभा में
केवल दो की ही आँखे तकतीं थी

उस ओर जिधर पसरा था

प्रेम का दर्पण जिसमें नित सबेरे
सखा सजा-संवरा करते हैं!
धो चरण सखा के
आलिंगन में ले सुदामा को
कृष्ण ने भरी सभा में
राजसिंहासन पर बिठाया
स्वयं थे बैठे समीप
सिंहासन के, किन्तु नींचे!

 

कहो सखा!
पूछ उठे माधव!
कहाँ थे रहते?
मेरे किस अपराध-वश
भूल गए थे गुरुभाई को?
मैं घिरा हुआ था राजभार से
किससे कहता? कैसे कहता?
बस मन ही मन मैं चुप रहता
मित्र तो केवल तुम ही थे!
ब्रज के वन जो घूमा करता
ऐसे स्वछंद कान्हा को
राजधर्म की जंजीरों में
बंधने का दर्द
आख़िर कौन सुनता?

कहते-कहते कृष्ण ने
जब मित्र के पैरों को देखा
अश्रुधार फिर बह निकले
पकड़ कर पाँव सुदामा के
लगे हाथों से सहलाने!
क्षमा करना सखा मेरे!
किन-किन कष्टों से आये तुम!
कैसे-कैसे दुर्दिन फिरे!
पूछ, मैं तुमसे ही प्रश्न कर बैठा!

केवल करने को मन संतुष्ट स्वयं का
धिक्कार मुझे है!

 

मित्रश्रेष्ठ कहतें हैं माधव
मुझ सुदामा को
जो गुरु-आश्रम में
वर्षा की रात

खा गया था
माधव का भी भाग!
जिसे दिया था गुरुमाता ने
बांटने को आधा-आधा!
यह सोच भर उठे नयन
आत्मग्लानि में सुदामा के!

बस कह उठे तुरंत
हे माधव! हे सखा! गुरुभाई!
अपराध नहीं तुम्हारा
किन्तु वह मेरा था, परिणामस्वरूप

ले भिक्षापात्र भटका हूँ मैं घर-घर
पाने को ठीक वही आधा भाग
जो खाया था मैंने गुरु-आश्रम में
वर्षा की रात तुम्हारे हिस्से का!

मैं मित्र नहीं! मैं श्रेष्ठ नहीं!
सच पूछो तो मानव ही नहीं!
जो मन में मेरे
मानवता रही थी!
उस आत्मग्लानि में अब तक तड़पा
क्षमा करो माधव मुझे!
नहीं! इसलिए नहीं कि

मैं तड़प रहा हूँ वर्षों से!
अपितु! क्षमा करो माधव, कि

अपनी आत्मग्लानि के कारण
मैंने मित्र-प्रेम से वर्षों तक
है तुमको वंचित रखा!
यह कह रो उठे सुदामा
फूट-फूट कर!
चकित सभा यह दृश्य देख!
दोनों में कौन मित्रश्रेष्ठ?

 

कहों सखा! पूछे माधव,
कैसी हैं भाभीश्री?
इतने वर्ष हैं बीत चुके अब तो

खेलते होंगे बच्चे आँगन में!
बताओ मुझे! क्या नहीं सुनाया?
बच्चों को किस्सा गुरु-आश्रम का
जहाँ हम सखा साथ-साथ पढ़ा करते थे!
क्या नहीं बताया?
कैसे मैं चंचल बस इधर-उधर ही
बाल-लीला किया करता था
और कैसे तुम सखा मेरे
ढँक मेरी चंचलता को
एक उदात्त भाव दिया करते थे!

क्या नहीं बताया? कैसे-कैसे?
एक चंचल-नटखट बच्चे को
बाँध दिया राजपाश से
करने को राज द्वारिका पर
बन द्वारिकाधीश!
ब्रज छूटा, छूटी राधा
छूटा यमुना तट भी
छूटी मईया, नन्दबाबा

छूटे संगी-सखा भी!
बस तीर लगे नन्हें शावक सा
इस राजभवन में, तड़पन में
मैं विचरण करता रहता हूँ!

बताओ मुझे! दिखाओ मुझे!
यह क्या है? बंधी पोटली?
क्यों छिपा रहे हो तुम
अपने इस गुरुभाई से?
क्या याद नहीं कई वर्ष-पूर्व
छिपा गए थे ऐसी ही पोटली
गुरु-आश्रम में वर्षा की रात
जो दिया था गुरु-माता नें!
हैं कसम तुम्हें मेरे नाम की!
जो पुनः दुहराकर वही कहानी
तुम्हारे दर्शन से मुझको
वर्षों तक वंचित रखोगे!

 

छूट गयी पोटली सुदामा से
लपक उठे झट से माधव,

खोले और बोले!

वाह-वाह! भेजा है भाभीश्री ने
चावल मुझको बहुत प्रेम से
भूख मेरी वर्षों की
अब जाकर पूरी होगी!
पहली मुट्ठी में भरकर
नेत्र-मूँद खा गए माधव
किंतु क्षुधा अभी भी
कुछ बची बाकी थी!
दूसरी मुट्ठी में भरकर
जैसे ही मुख के अन्दर निगले
सौंप चुके थे माधव
दो लोक सुदामा को!
थे प्रेम में डूबे इतने माधव
फिर भी भूख मिटी नहीं
पुनः पोटली में डाल हाथ
भर लिए तीसरी मुट्ठी भी!
जैसे हुए खाने को
हाथ पकड़ बैठी
लक्ष्मी-रूपा रुक्मणि!
कर उठीं विनय,
हे प्राणनाथ! हे जगन्नाथ!
कुल मिलाकर बस
अब एक ही लोक बचा है!
हे कृपासागर! करो कृपा!
रहने दें यह एक लोक
बाकी सारे मानव की!

ध्यान भंग! छूटे माधव!
उस प्रेम भरी तन्द्रा से
शुरू हुई पुष्प-वर्षा
आकाश से देवों के द्वारा!
स्मरण रहेगा जग को सदा

यह मित्र-प्रेम!

हे मित्रश्रेष्ठ!

-अमर कुशवाहा