Friday, February 21, 2025

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा…

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा
मैं अपनी मुहब्बत ज़ुबानी लिखूँगा
मेरे दिल में जो हैं तेरी आँखों में होंगे
मैं बहती नदी पर जब पानी लिखूँगा!

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा!

कोयल अभी भी कूकती तो होगी
गलियाँ अभी भी महकती तो होंगी
दरख़्तों का क्या है वो दरकते रहेंगे
मैं अपनी क़लम से रवानी लिखूँगा!

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा!

मेरी राहें कभी तुमसे टकरा जो जायें
गुज़रा जमाना वो फ़िर याद आ जाये
तुम हँसके तो दामन छुड़ा तो लोगी
मैं अपने हिस्से की नादानी लिखूँगा!

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा!

ये रातें मेरी हैं जो सोती नहीं हैं
तुमसे भी बातें अब होती नहीं हैं
औरों की क़िस्मत जहानी भी होंगे
मैं रिश्तों को फ़िर भी रूहानी लिखूँगा!

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा!
मैं अपनी मुहब्बत ज़ुबानी लिखूँगा!
मेरे दिल में जो हैं तेरी आँखों में होंगे
मैं बहती नदी पर जब पानी लिखूँगा!

किसी दिन तुम्हारी कहानी लिखूँगा!

-अमर कुशवाहा

Tuesday, October 29, 2024

मैं भीड़ में नहीं चलूँगा

नहीं!

मैं भीड़ में नहीं चलूँगा
भीड़ में मुझे चलना भी नहीं आया!
भले सारे ही जा रहे हों
क्षितिज के उस पार!

सुना है मैंने, कि
वहाँ शांति बिखरी हुयी है चारों ओर
पक्षियों का कलरव-संगीत भरा है बयार में
संतोष की आभा फैली है सबके चेहरों पर
और, प्रकृति अपने प्राकृतिक रूप में है अभी भी!

जानता हूँ मैं तुम्हारे प्रेम को
मुझे खींच ले जाना चाहते हो
ठीक उसी दुनिया में, जहाँ
रीतियों में बँधकर मुक़्त हैं!

किंतु! मुझे स्वीकार है
यह मुक्तता का बंधन!
मनुष्य की नग़्न आत्मा की कुरूपता
और टूटती प्रकृति का यह शोर!

छोड़ों! रहने दो मुझे यहीं पर
मैं भीड़ में नहीं चलूँगा,
मैं भीड़ नहीं हो पाऊँगा!

        -अमर कुशवाहा

Wednesday, July 3, 2024

Hindi Literature Notes_Vol.3

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